शारदीय नवरात्रि की षष्ठी तिथि के साथ बंगाली दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत हो गई है। रायपुर के माना इलाके में दुर्गोत्सव की रौनक देखते ही बन रही है। यहां पुरी के जगन्नाथ मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर भव्य पंडाल तैयार किया गया है।
इस पंडाल को तैयार करने में कोलकाता से आए कारीगरों ने महीनों मेहनत की है। खास बात यह है कि इस आयोजन में भव्यता के साथ बंगाली परंपराओं का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है।
सालों से चली आ रही इस परंपरा में माता की प्रतिमा बनाने से पहले वेश्यालय के स्थान सहित अन्य जगहों से मिट्टी और नदियों का जल मंगवाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इनका उपयोग कर माता की प्रतिमा तैयार की जाती है।
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22 लाख में बना जगन्नाथ मंदिर पंडाल
माना कैंप की सार्वजनिक श्री श्री दुर्गा पूजा समिति ने इस बार पुरी के जगन्नाथ मंदिर की थीम चुनी है। समिति के अध्यक्ष रंजीत कुमार डे ने बताया कि पंडाल को तैयार करने में करीब डेढ़ महीने का समय लगा। कोलकाता से आए 22 कारीगरों ने मिलकर इसे तैयार किया। केवल पंडाल निर्माण में करीब 20 से 22 लाख रुपए खर्च हुए हैं।
उन्होंने बताया कि समिति वर्ष 1964 से दुर्गा पूजा का आयोजन कर रही है। शुरुआत में पूजा साधारण तरीके से होती थी। समय के साथ आयोजन का स्वरूप बदलता गया और पंडाल, सजावट तथा रोशनी की व्यवस्था बेहतर होती गई। अब आयोजन पहले की तुलना में काफी भव्य हो गया है।
47 हजार से 48 लाख पहुंचा बजट
रंजीत कुमार डे ने बताया कि साल 1995 में पूजा का बजट करीब 47 हजार रुपए था, जो आज बढ़कर 45 से 48 लाख रुपए तक पहुंच गया है। पंडाल तैयार करने का काम कोलकाता के कारीगरों ने किया है, जबकि सड़क पर आकर्षक रोशनी की व्यवस्था कोलकाता के चंदननगर के कारीगरों ने की है।
माता की प्रतिमा बनाने में भी कोलकाता के कारीगरों के साथ स्थानीय कारीगर बिजू घोष सहयोग करते हैं। इस तरह आयोजन में बाहर से आने वाले कारीगरों के अनुभव और स्थानीय कलाकारों की भागीदारी दोनों देखने को मिलती हैं।
पंडाल बनाने में 16 लाख रुपये खर्च
माना में काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर बना मां दुर्गा का पंडाल भी भव्य आकर्षण का केंद्र है। माना बाजार सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति के सचिव विष्णु नाथ पाल ने बताया कि इस साल दुर्गा पूजा के लिए पंडाल बनाने में करीब 16 लाख रुपये खर्च हुए हैं। पंडाल तैयार करने के लिए कोलकाता से 25 से 30 कारीगर आए थे। ये कारीगर करीब दो महीने तक लगातार काम कर रहे थे। पंडाल का काम पूरा होने के बाद वे अपने गांव लौट गए, ताकि त्योहार मना सकें।
वेश्यालय के स्थान से मिट्टी लाई जाती है
विष्णु नाथ पाल ने बताया कि बंगाली दुर्गा पूजा में परंपराओं का विशेष महत्व है। माता की प्रतिमा बनाने के लिए बंगाली परंपरा के अनुसार वेश्यालय के स्थान से मिट्टी लाई जाती है। इसके साथ ही प्रतिमा बनाने वाले कलाकार कोलकाता की कुम्हार टोली से भी मिट्टी लाते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है।
उन्होंने बताया कि पूजा में जल से जुड़ी परंपरा का भी पालन किया जाता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों से जल लाने की परंपरा है। वहां से जल लाना संभव नहीं होने के कारण 21 घरों से गंगाजल एकत्र किया जाता है। इस गंगाजल को मिलाकर परंपरागत विधि से पूजा की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसके बाद साधारण पानी मिलाकर माता की प्रतिमा तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।





