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महानदी से महोदधि तक स्पंदित रथयात्रा की विरासत

 

छत्तीसगढ़ में रथयात्रा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है तथा इस दिन मांगलिक कार्य करना भी शुभ माना जाता है। वैसे तो मुख्य रथयात्रा का पर्व ओडिशा के पुरी में मनाया जाता है, परन्तु छत्तीसगढ़ की सीमा से ओडिशा के लगे होने एवं हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों के कारण वहाँ के तीज-त्यौहारों का प्रभाव छत्तीसगढ़ी जनमानस पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से रायगढ़, सारंगढ़, चन्द्रपुर, सक्ती, अड़भार, सारागांव, लवसरा, चांपा, जांजगीर, शिवरीनारायण, मल्हार, बिलासपुर, रतनपुर, रायपुर, राजिम, बस्तर, राजनांदगांव, पांडादाह, खैरागढ़, छुईखदान, गढ़फुलझर, घटोलपाली तथा अन्य अनेक स्थानों पर रथयात्रा निकाली जाती है। यहाँ आसपास के गाँवों से श्रद्धालु आकर भगवान जगन्नाथ की पूजा करते हैं तथा गुड़ और मूंग का प्रसाद ग्रहण करते हैं।

यहाँ के राजा-महाराजाओं एवं जमींदारों की भगवान जगन्नाथ के प्रति अगाध आस्था दिखाई देती है। यह यात्रा पहले राजपरिवारों से लोक तक पहुँची अथवा लोक से राजपरिवारों तक, यह शोध का विषय है। क्योंकि प्राचीन भारतीय परंपरा में राजधर्म ही प्रजाधर्म बन जाता था। राजा-महाराजाओं ने अपनी श्रद्धा के अनुसार अपने-अपने क्षेत्रों में भगवान जगन्नाथ के मंदिरों का निर्माण कराया तथा वहाँ विग्रह स्थापित कर रथयात्रा निकालने की परंपरा प्रारंभ की।

छत्तीसगढ़ का लोकमानस आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पर्व को अत्यंत शुभ मानता है। इसलिए इस तिथि को बहू लाना, बेटी की विदाई, गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। इसका एक प्रमुख कारण लोकजीवन में भगवान जगन्नाथ के प्रति गहरी आस्था का होना है।

गरियाबंद जिले के देवभोग स्थित जगन्नाथ मंदिर का इतिहास लगभग डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। क्षेत्र के 84 गाँवों के सहयोग से इस मंदिर के निर्माण में 47 वर्ष लगे। यह एक ऐसा मंदिर है, जहाँ भक्त अपने भगवान को “लोन” (ऋण) भी देते हैं। यहाँ भोग के रूप में प्राप्त होने वाले चावल और मूंग का एक भाग पुरी के जगन्नाथ मंदिर भेजा जाता है। कहा जाता है कि देवताओं के लिए यहाँ से भोग भेजे जाने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘देवभोग’ पड़ा।

प्रदेश के शिवरीनारायण तीर्थ में रथयात्रा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। प्रो. अश्विनी केशरवानी अपने लेख में लिखते हैं कि स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र कहा गया है। प्राचीन काल में यहाँ शबरों का निवास था। द्वापर युग के अंतिम चरण में जरा शबर के बाण से भगवान श्रीकृष्ण घायल हुए और उन्होंने देह त्याग दी। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया गया, किंतु उनका शरीर पूर्णतः अग्नि में भस्म नहीं हुआ। तब उसे समुद्र में प्रवाहित कर दिया गया।

कथा के अनुसार जरा शबर को जब इसका पता चला तो वह उस दिव्य देह को लेकर श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलकुंड के समीप बाँस के वृक्ष के नीचे स्थापित कर उसकी पूजा करने लगा। बाद में वह तंत्र-मंत्र की साधना भी वहीं करने लगा। यही दिव्य विग्रह आगे चलकर नीलमाधव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ओड़िया कवि सरलादास ने भी उल्लेख किया है कि नीलमाधव को बाद में पुरी ले जाकर स्थापित किया गया।

डॉ. जे. पी. सिंहदेव तथा डॉ. एल. पी. साहू ने Cult of Jagannath and Cultural Profile of South Kosala में उल्लेख किया है कि भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शिवरीनारायण से पुरी ले जाने वाले केवल विद्यापति ही नहीं थे, बल्कि तांत्रिक परंपरा के आचार्य इंद्रभूति का भी इससे संबंध रहा।

इंद्रभूति ने इस क्षेत्र में तांत्रिक साधना की तथा वज्रयान बौद्ध परंपरा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी बहन लक्ष्मीकरा भी इस परंपरा की प्रमुख साधिका मानी जाती हैं। बाद में भगवान नीलमाधव की प्रतिष्ठा पुरी में भगवान जगन्नाथ के रूप में हुई। प्रारंभिक काल में मंदिर पर तांत्रिक प्रभाव था, जिसे आदि शंकराचार्य ने वैदिक परंपरा से जोड़कर व्यापक सनातन स्वरूप प्रदान किया।

लोककथा के अनुसार जरा शबर अपने आराध्य नीलमाधव के वियोग में अत्यंत व्यथित हुआ। तब भगवान ने उसे नारायण स्वरूप में दर्शन देकर वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के दिन जो भी श्रद्धापूर्वक उनके दर्शन करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इसी कारण शिवरीनारायण को मोक्षदायिनी नगरी भी कहा जाता है। आज भी यहाँ भगवान नारायण का विग्रह तथा उनके चरणों का स्पर्श करता रोहिणी कुंड श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

बस्तर में मनाया जाने वाला रथयात्रा का पर्व ‘गोंचा परब’ कहलाता है। गोंचा का अर्थ तुपकी (खोखले बांस से बनी पिस्तौल जैसी) से ‘पेंग’ (एक जंगली फल) को गोली की तरह दागना है। इस पर्व की शुरुआत लगभग 1408 ईस्वी में काकतीय वंश के राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा की गई थी। राजा जगन्नाथ पुरी से ‘रथपति’ की उपाधि और 16 पहियों वाला रथ लेकर आए थे। यह उत्सव रथयात्रा से शुरू होकर बाहुआ गोंचा (भगवान की वापसी) तक कई दिनों तक चलता है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

इस प्रकार जगन्नाथ रथयात्रा ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने वाला महापर्व है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह किसी जाति विशेष का पर्व नहीं, बल्कि लोक का उत्सव है। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि वह सभी भेदों को मिटाकर राज्यों की सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों को एक सूत्र में बाँधती है। यही हमारी संस्कृति का अद्भुत वैभव और एकात्म चेतना है।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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