पहले दिन निषादराज गुह्य की लीला का हुआ मंचन,
16 अक्टूबर को भक्तिमती शबरी और 17 अक्टूबर को श्रीहनुमान चरित की होगी प्रस्तुति
बालाघाट । मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा रामकथा साहित्य में वर्णित विशिष्ट चरित्रों पर आधारित तीन दिवसीय ‘लीला समारोह’ का शुभारंभ 15 अक्टूबर को रामपायली स्थित श्रीरामपायली मंदिर परिसर में हुआ। जिला प्रशासन बालाघाट के सहयोग से आयोजित इस समारोह में श्रीरामकथा के महत्वपूर्ण प्रसंगों को लीला नाट्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। समारोह में प्रतिदिन शाम 7 बजे से प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं।
समारोह के प्रथम दिन 15 अक्टूबर को ‘निषादराज गुह्य’ लीला नाट्य का मंचन किया गया। इसका पुनर्संयोजन बैतूल के राकेश बरवड़े ने किया है। लीला नाट्य के माध्यम से भगवान श्रीराम और वनवासी समुदाय के बीच आत्मीय संबंधों, निषादराज के प्रेम तथा केवट की अनन्य भक्ति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।

समारोह के दूसरे दिन 16 अक्टूबर को ‘भक्तिमती शबरी’ लीला नाट्य की प्रस्तुति होगी। इसका पुनर्संयोजन बालाघाट के रूपकुमार बनवाले द्वारा किया गया है। वहीं, समारोह के अंतिम दिन 17 अक्टूबर को ‘श्रीहनुमान’ लीला नाट्य का मंचन किया जाएगा, जिसका पुनर्संयोजन उज्जैन के सतीश दवे ने किया है। इन प्रस्तुतियों के आलेख योगेश तिवारी, रीवा द्वारा तैयार किए गए हैं, जबकि संगीत संयोजन मिलिंद त्रिवेदी एवं किशन रॉय ने किया है।
निषादराज गुह्य लीला में राम-केवट प्रसंग का भावपूर्ण चित्रण
प्रथम दिवस प्रस्तुत निषादराज गुह्य लीला नाट्य में भगवान श्रीराम की वन यात्रा, निषादराज से उनकी भेंट तथा गंगा पार कराने के दौरान केवट के साथ हुए संवाद को प्रमुखता से दर्शाया गया। कथा के अनुसार, निषादराज भगवान श्रीराम से अपने राज्य चलने का आग्रह करते हैं, लेकिन 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करने के संकल्प के कारण श्रीराम उनका आग्रह स्वीकार नहीं करते।
इसके बाद गंगा तट पर केवट और भगवान श्रीराम का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। केवट भगवान श्रीराम के चरण पखारने के बाद ही उन्हें नाव में बैठाने की बात कहता है। भगवान की अनुमति मिलने पर वह उनके चरण पखारता है और गंगा पार उतारने के बाद उतराई लेने से भी मना कर देता है। केवट कहता है कि वह लोगों को गंगा पार कराता है, जबकि भगवान श्रीराम जीवों को भवसागर से पार लगाते हैं। इसलिए वह उनसे उतराई नहीं ले सकता।
लीला नाट्य में भगवान श्रीराम की चित्रकूट से पंचवटी तक की यात्रा, रावण वध और अयोध्या वापसी के साथ राज्याभिषेक के प्रसंग भी शामिल किए गए। इस प्रस्तुति के माध्यम से भगवान श्रीराम और वनवासी समुदाय के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और आत्मीयता के संबंधों को उजागर किया गया।
दूसरे दिन होगी भक्तिमती शबरी की भक्ति और समर्पण की प्रस्तुति
16 अक्टूबर को मंचित होने वाली ‘भक्तिमती शबरी’ लीला नाट्य में माता शबरी की अनन्य भक्ति, त्याग और भगवान श्रीराम के प्रति अटूट विश्वास की कथा प्रस्तुत की जाएगी। लीला के कथानक के अनुसार, शबरी अपने पूर्व जन्म में रानी थीं और भक्ति करना चाहती थीं, लेकिन परिस्थितियों के कारण उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाती। अगले जन्म में भील समुदाय में जन्म लेने के बाद विवाह के अवसर पर पशुबलि का विरोध करते हुए वे घर छोड़ देती हैं और मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचती हैं।
मतंग ऋषि से दीक्षा प्राप्त करने के बाद शबरी भगवान श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा में अपना जीवन समर्पित कर देती हैं। वृद्धावस्था में मतंग ऋषि उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि भगवान श्रीराम उन्हें दर्शन अवश्य देंगे। लीला नाट्य में गिद्धराज मिलाप, कबन्धासुर संवाद तथा भगवान श्रीराम और माता शबरी के मिलन के प्रसंगों का मंचन किया जाएगा।
भगवान श्रीराम और माता शबरी के मिलन के दौरान नवधा भक्ति का उपदेश तथा माता सीता तक पहुंचने के मार्ग की जानकारी देने का प्रसंग भी प्रस्तुत होगा। अंत में माता शबरी के समाधि लेने के दृश्य के साथ उनकी भक्ति और समर्पण की कथा पूर्ण होगी।
अंतिम दिन प्रस्तुत होगा श्रीहनुमान का चरित
समारोह के अंतिम दिन 17 अक्टूबर को ‘श्रीहनुमान’ लीला नाट्य के माध्यम से भगवान श्रीहनुमान के अद्भुत पराक्रम, भक्ति और दैवीय शक्तियों से जुड़े प्रसंगों का मंचन किया जाएगा।
इस लीला नाट्य में श्रीहनुमान के बाल्यकाल में सूर्य को निगलने की लीला तथा देवताओं द्वारा उन्हें विभिन्न शक्तियां प्रदान किए जाने के प्रसंगों को दर्शाया जाएगा। भारतीय पौराणिक आख्यानों में श्रीहनुमान को परम भक्त के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। उनका चरित्र शक्ति, समर्पण और भक्ति के विभिन्न स्वरूपों को एक सूत्र में पिरोता है।
लीला नाट्य में श्रीहनुमान के चरित्र के माध्यम से भक्ति की व्यापक अवधारणा और विभिन्न दैवीय शक्तियों के समन्वय को प्रस्तुत किया जाएगा।
तीन दिवसीय यह लीला समारोह रामकथा के विशिष्ट चरित्रों और प्रसंगों को नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से जनसामान्य तक पहुंचाने का प्रयास है। श्रीरामपायली मंदिर परिसर में आयोजित इस समारोह में श्रद्धालुओं और कला-संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को रामकथा के प्रेरक प्रसंगों को देखने और उनसे जुड़ने का अवसर मिल रहा है।
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